कहर =दोहे

सूनी सूनी सड़क है, सूना है संसार
पतझड़ जैसे पतन है, विलख रहे परिवार
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घर में कैदी की तरह, जीवन रहे विताय
कहर भयानक है बहुत, कुछ भी समझ न आय

Comments

3 responses to “कहर =दोहे”

  1. अति सुन्दर रचना 

  2. Amita

    मार्मिक अभिव्यक्ति

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