छपरा जिला के सांई गाँव में ग्वालों की घनी आवादी थी। वहाँ के लोग गाय भैंस पाल कर ही अपना घर परिवार चलाते थे। उसी गाँव में राम नाम का एक ग्वाला था। वह प्रतिदिन शाम के समय बाजार में दूध बेचने जाया करता था। कभी कभार घर लौटने में देर हो जाया करता था। उस रात भी उसे देर हो चुकी थी। रात के यही कोई दस या सवा दस का वक्त था। वह अपनी साईकिल से मस्ती में आ रहा था। रास्ता सुनसान की आगोश में सो चुकी थी। रास्ते में एक राही भी उसे दिखाई नहीं दिया। फिर भी राम अपनी धुन में मंजिल तय करने मे मशगूल था। पूस की रात थी। ठंड काफी बढ़ चुका था। उस पर पछुआ के ब्यार राम के जिस्म को कंपा दिया करता था। फिर भी पापी पेट का सवाल था। दो किलोमीटर की दूरी पे कहीं कहीं बिजली के खंबे लगे हुए थे। परंतु बिजली नदारद थी। इसलिए राम के हाथ में दो सेल का एक 🔦 था। टॉर्च जलाते हुए बांध पर तेजी से जा रहा था। अचानक किसी की आवाज़ उसके कानो में टकराई … ” ए जरा रुको”। राम चारो तरफ टॉर्च जला कर देखा। मगर उसे कहीं कुछ दिखाई नहीं दिया। राम हिम्मत बांध कर जैसे ही आगे बढ़ने वाला था कि अचानक फिर वही आवाज ” ए जरा रुको “।राम पुन: अपनी टॉर्च चारो तरफ घुमाया। अचानक राम की नज़र एक अधेर उम्र की व्यक्ति पर पड़ी। वह लाठी के सहारे बांध के नीचे से उपर की ओर रास्ते के तरफ आ रहा था।
शेष अगले अंक में
कहाँ गया वो ? (रहस्य रोमांच)
Comments
5 responses to “कहाँ गया वो ? (रहस्य रोमांच)”
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सुन्दर
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बहुत खूब
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सुन्दर
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उत्तम रचना
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Awesome
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