कहां आ गए हैं हम।

कहां आ गए हैं हम,
जहां खामोश-सी शामें हैं।
और चुप-सा सूरज उगता है।
ना बांटता है मुस्कान,
ना रौनकें फैलाता है।

Comments

14 responses to “कहां आ गए हैं हम।”

  1. गमगीन रचना

  2. हाँ सब कुछ बदल गया है
    फिर भी कहाँ गिला है

  3. Aayhay…
    लाजवाब, जबरदस्त, बहुत खूब और कितनी तारीफ करूं बस इतना ही आता है…

    1. 🙏🙏🙏 धन्यवाद जी

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    शानदार

  5. Pratima chaudhary

    🙏

  6. Deep Patel

    मुश्किलों के दौर में थोड़ा संभल कर चलो,
    अनुभवों से सीख लो और निखर कर चलो।
    कठिनाइयाँ तो आएंगी और चली जाएंगी,
    सजग होकर इसी तरह नए सफ़र पर चलो।

    1. बहुत खूब
      हार्दिक धन्यवाद

  7. बहुत उम्दा

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