काला पानी के नाम से,
प्रसिद्ध वह स्थान है
जहां भेजे जाते थे ,
भारत के स्वतंत्रता सेनानी।
सैल्यूलर जेल के नाम से
जो वहीं विद्यमान है ।
पोर्ट ब्लेयर के नाम से
आजकल उसको जाना जाता है,
कोई वापिस नहीं आया, जो गया वहां
ऐसा माना जाता है ।
वहां वीर-संवारकर जी ,
का कमरा भी देखो,
दस फुट का आकार है
फांसी घर को देख के,
हृदय में मच गया,
हा-हाकार है ।
अंग्रेजों ने जाने कितने,
भयानक जुल्म ढहाए थे
कोड़े मारे नंगी पीठों पर,
वो कितने करहाए थे ।
बोरों में भरके खुजली चूरन,
जबरन पहनाया जाता था
जब वो दर्द से करहाते थे,
अंग्रेज़ों द्वारा आनन्द उठाया जाता था
डांसिंग इंडियन कह कर उनको,
ठहाके लगाए जाते थे ।
इंसानों से कोल्हू चलवाकर,
नारियल तेल निकलवाए जाते थे।
खाने में फ़िर कंकड़ वाली,
दाल ही दे दी जाती थी ।
रोटी में भी अक्सर मिट्टी
की शिकायत आती थी ।
कैसे-कैसे ज़ुल्म सहे थे,
सुन के भी दिल थर्राता है,
ऐसे किस्से सुन-सुन के,
जी तो घबराता है ।..
काला पानी (भाग 1)
Comments
12 responses to “काला पानी (भाग 1)”
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कवि गीता जी की इस कविता में भारत की ऐतिहासिकता संघर्ष व स्थान की बारीकियों का बेहतरीन व सफल चित्रण किया गया है। जो कि कथ्य पर उनकी बारीक पकड़ को परिलक्षित करता है। भारत की ऐतिहासिकता व संघर्ष पर ऐसी बेजोड़ पंक्तियाँ कोई मझा हुआ रचनाकार ही लिख सकता है। वर्णनात्मक शिल्प और बोधगम्य भाषा में बेहतरीन रचना है यह
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इस शानदार समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी । आपकी प्रेरक समीक्षाएं हमेशा ही मेरा मार्ग दर्शन करती हैं । आपकी लेखनी से निकली सुंदर और सटीक टिप्पणी के लिए आपका आभार
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अतिसुन्दर रचना
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Thanks Piyush ji for your precious compliment.
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वाह गीता जी बहुत खूब
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आपका हृदय तल से धन्यवाद चंद्रा मैम 🙏 बहुत बहुत आभार
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बहुत सुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद आपका जोशी जी🙏
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बढ़िया, बहुत खूब
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बहुत बहुत धन्यवाद सर 🙏 आभार
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काबिल- ए-तारीफ़
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सादर धन्यवाद भाई जी 🙏 बहुत बहुत आभार
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