कितनी पी लेते हो जो
होश नहीं रहता है
जमाना तुम्हें शराबी
कहके हँसता है…
इतना धुत हो जाते हो कि
कुछ भी याद नहीं रहता है!
किसे क्या कहते हो
कुछ होश तुम्हें रहता है…
पीटते बच्चों को हो
नशे में तुम
दुःखी करते हो अपनी
पत्नी को तुम…
छोंड़ते कहाँ हो तुम
पुरखों तक को
हो गली के गीदड़
बनते शेर हो तुम…
लाज आती ना तुमको
करनी पर अपनी
ताव देते हो तुम
मूँछों पर अपनी…
कहाँ की है यह
मर्दानगी बताओ
नालियों में गिरते चलते हो
अब ना और छुपाओ…
सब रहता है याद तुम्हें
नशे का सिर्फ बहाना
ये नाटक जाकर तुम
कहीं और दिखाना…
ना जाने कितने घर नशे में
बर्बाद हो गए
ना जाने कितने लोग
मौत की नींद सो गए…
छोंड़ दो आज से तुम ये
दारू पीना
सीख लो बीवी बच्चों की
खातिर जीना…
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