किताब मेरी

कविता-किताब मेरी
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इतनी खूबसूरत तो नहीं है ।
जो तेरे लिये दिन रात तड़पता हूं ।
तू किताब मेरी,बसी तुझी में जान है
तभी रात भर जग जग के पढ़ता हूं।

जिसने किया बेवफाई तुझसे ,
उसकी जिंदगी संवर नहीं सकती|
जिसने सहा नहीं तेरे राह का ठोकर,
जमाने में उसकी कीमत हो नहीं सकती|

थूक देंगे जमाने के लोग तुझ पर,
अगर तुझे जमाने का ज्ञान नहीं |
चूम लेगे जमाने के लोग तुझको,
अगर तेरे ज्ञान में पाखंड नहीं|

एक सच्चाई! तेरी बयां करता हूं,
तू बिकती है बाजार में,
चंद लोगों ने चंद कमाई के खातिर,
तुझे बदनाम कर रखा है|
कहीं पुण्य प्रताप तो –
कहीं अश्लीलता की भाग ,
कहीं गीता कुरान बना रखा है|

हे किताब तुझे समझने के लिए,
कई रातों की नींद गवाया हूं|
किताब तू महान है-
कई वर्षों के बाद समझ पाया हूं|
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
——- ऋषि कुमार “प्रभाकर”——-

Comments

6 responses to “किताब मेरी”

  1. Satish Pandey

    बहुत खूब ऋषि, खूब पढ़ना है, आगे बढ़ना है। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

  2. Geeta kumari

    पुस्तकों की महत्ता पर प्रकाश डालती हुई बहुत सुंदर रचना है।
    पुस्तकें हमें ज्ञान भी देती है और हमारी सच्ची मित्र भी होती है।
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

  3. बहुत ही सुन्दर

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बहुत सुंदर पंक्तियां

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