मुझे मिटाकर कहता है वो
तुम पहले जैसी नहीं रही,
फकत शक्ल ही बची है
खुशबू नहीं रही…
खुशबू नहीं रही
Comments
11 responses to “खुशबू नहीं रही”
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nice
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Tq
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Nice lines
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Thanks
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मन में उठ रहे जज्बात, ठेस मिलने पर उपजी संवेदना, परिलक्षित हो रही है। भाव और लय का सुन्दर तारतम्य है।
बहुत खूब लिखा है प्रज्ञा जी-

Apki taarif me dam h
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खिन्न हृदय के जज्बातों को बहुत ही खूबसूरती और लय बद्ध तरीके से बयां किया है, कवियित्री ने लेखनी में दम है भई ।
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बहुत बहुत आभार
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सरल शब्दों में जीवन की पूर्णबंदी को उजागर करना
सिर्फ आपसे ही ग्रहण किया जा सकता है-

Thanks
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आपकी समीक्षा मुझे बेहद पसंद है
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