खुशबू नहीं रही

मुझे मिटाकर कहता है वो
तुम पहले जैसी नहीं रही,
फकत शक्ल ही बची है
खुशबू नहीं रही…

Comments

11 responses to “खुशबू नहीं रही”

  1. मन में उठ रहे जज्बात, ठेस मिलने पर उपजी संवेदना, परिलक्षित हो रही है। भाव और लय का सुन्दर तारतम्य है।
    बहुत खूब लिखा है प्रज्ञा जी

  2. Geeta kumari

    खिन्न हृदय के जज्बातों को बहुत ही खूबसूरती और लय बद्ध तरीके से बयां किया है, कवियित्री ने लेखनी में दम है भई ।

    1. बहुत बहुत आभार

  3. सरल शब्दों में जीवन की पूर्णबंदी को उजागर करना
    सिर्फ आपसे ही ग्रहण किया जा सकता है

    1. आपकी समीक्षा मुझे बेहद पसंद है

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