7 Comments

  1. हे प्रकृति की मासूम प्रतिनिधि! हम
    तुम्हारे अपराधी हैं..
    हम लालची इंसानों ने छीना तुमसे तुम्हारा
    आवास, तुम्हारे हिस्से का आकाश,
    और तुम्हारी परवाज़…!!
    ——— बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ। आपकी कविता उच्चस्तरीय है। एक सशक्त प्रस्तुति है यह। लेखनी का अभिवादन

  2. वो सुबहें, जो शुरू होती थी तुम्हारी
    चहचहाहटों के साथ और वो शामें,
    जब आकाश आच्छादित होता था तुम्हारे
    घोसलों में लौटने की आतुरता से…!!
    _________गौरैया दिवस पर मासूम सी प्यारी सी गौरैया को याद करती हुई कवियत्री अनु जी की बेहद शानदार प्रस्तुति, अति उत्तम लेखन

  3. गौरैया,
    जाने कहाँ उड़ गई तुम
    अपने मखमली परों में बाँध के
    वो सुबहें, जो शुरू होती थी तुम्हारी
    चहचहाहटों के साथ और वो शामें,
    जब आकाश आच्छादित होता था तुम्हारे
    घोसलों में लौटने की आतुरता से

    गौरैया दिवस पर बेहद शानदार रचना

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