घड़ी

एक छोटी -सी डब्बी में
नाचती हैं सूईयाँ
बेशक बन्द होकर।
पर नचाती है
सारी दुनिया को
अपनी हीं नोंक पर।।
न ठहरती है कभी
न कभी ठहरने देती है।
ये तो घड़ी है ‘विनयचंद ‘
दुनिया को घड़ी बना देती है।।

Comments

4 responses to “घड़ी”

  1. वाह! बहुत सुंदर

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