चला चली का मेला

आखिर इक दिन सबको जाना है

यह जग चला चली का मेला है
यहाँ किसी का नही ठिकाना है
फिर किस बात का घबराना है
बस इतना सा हमारा अफ़साना है
आख़िर इक दिन सबको जाना है

ना कुछ संग आया था,ना जाना है
कर्मो ने ही अपना फर्ज निभाना है
पाप पुण्य की गठरी बांध उड़ जाना है
पांच तत्व की काया को मिट्टी हो जाना है
आखिर इक दिन सबको जाना है

आत्मा को आवागमन से मुक्त कर क्षितिज पार जाना है
कुछ प्रतीक्षारत तारों को एक बार गले लगाना है
फिर मोह माया की डोर तोड़ रूहानी यात्रा पर जाना है
आत्मा को परमात्मा में विलीन हो जाना है
आखिर इक दिन सबको जाना है।

Comments

13 responses to “चला चली का मेला”

  1. Geeta kumari

    सच ही लिखा है आपने, बहुत सुंदर और यथार्थ परक रचना

    1. Anu Singla

      धन्यवाद गीता जी

  2. Anu Singla

    बहुत बहुत आभार

    1. Anu Singla

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Satish Pandey

    यह जग चला चली का मेला है
    यहाँ किसी का नही ठिकाना है
    फिर किस बात का घबराना है
    बस इतना सा हमारा अफ़साना है
    आख़िर इक दिन सबको जाना है।
    ——– जीवन दर्शन से जुड़ी बहुत सुन्दर रचना। बेहतरीन प्रस्तुति

  4. Anu Singla

    बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Pragya Shukla

      Happy women’s Day Dear Anu

  5. सही कहा अनु…
    Thought full poetry

    1. Anu Singla

      बहुत बहुत धन्यवाद
      आप कहां थे इतने दिन

      1. Pragya Shukla

        जीवन में बहुत उतार चढ़ाव दिख रहे हैं,
        उन्हीं में व्यस्त थी पर अब आ गई हूँ…
        आपने नोटिस किया यह बहुत अच्छा लगा…

  6. महिला दिवस पर कुछ लिखो मेरी इच्छा है

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