चलो फिर से कुरेदते हैं।

चलो फिर से कुरेदते है

बीती सुध को,
चंद निमेषों को,
अनुराग भरें संदेशों को,
चलो फिर से कुरेदते है।

क्या अनुपम वेला!
आह्लादों का मैला!
प्रेम-क्रीडा से; मैं था खेला,
गुजरे वक्त की किताबो को,
चलो फिर से खोलते हैं।
क्षत को ,
चलो फिर से कुरेदते है।

टीस की घुट्टी,
दर्द का तुफान,
बैचेनियों की सरसराहट;
आया उफान,
तनहाई के पत्तों को
चलो फिर से बिखेरते हैं,
अभागी नियति को,
चलो फिर से कुरेदते हैं
                  — मोहन सिंह (मानुष)

Comments

9 responses to “चलो फिर से कुरेदते हैं।”

  1. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    बहुत सुंदर काव्य सृजन

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      मेरी रचना को अपना कीमती समय देने के लिए और समीक्षा करने के लिए, हृदय की गहराइयों से ,बहुत-बहुत आभार एवं बहुत-बहुत धन्यवाद

  2. सुंदर रचना

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      धन्यवाद 🙏 जी

  3. Satish Pandey

    संयोग श्रृंगार की यादों को ताजा करती पंक्तियाँ कविता की पूर्णता पर वियोग से ही जूझते रहने का अहसास करा रही हैं, तद्भव, तत्सम एवं अरबी-फ़ारसी शब्दों का का सुंदर तालमेल है. वाह

  4. Shabdkosh bahut hi Sundar Aur vyapak Hai alankaran ka Yatra uchit prayog Kiya gaya hai

  5. Pratima chaudhary

    जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम
    बहुत सुंदर पंक्तियां

  6. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत बहुत आभार

Leave a Reply

New Report

Close