चिठ्ठियों की वेदना

चिठ्ठियों की वेदना
कभी सुनी है तुमने?
कितना सिसक-सिसककर
रोती हैं
एक पते को ढूढ़ने में
जमाने लगते थे
अब बात क्षण भर में पहुँचती है
लिखने वाले और पढ़ने वाले में
एक कल्पना का समन्वय होता था
विचार रूह तक पहुँचते थे
प्रेमी और प्रेमिका के
चेहरे चिठ्ठियों में दिखते थे
सालों तक दिल से लगा के
रखते थे लोग अपने अपनों की चिठ्ठियों को
इन्तज़ार रहता था डाकिये का बेसब्री से
चिठ्ठियों में भाव प्रकट होते थे।।

Comments

2 responses to “चिठ्ठियों की वेदना”

  1. बहुत खूब लिखा है आपने

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद

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