झर-झर आँसू बहते उनके
झरना बनकर आँखों से।
मरणासन्न कर छोड़ा उनको
दुष्ट काटकर पाँखों से।।
परवाह नहीं थी निज दुख की
वश राम नाम का जाप सदा।
करते विनती रुको काल तुम
राम लखन केआवन कर अदा।।
सीता हरण का दे संदेश
सहर्ष साथ चलूंगा मैं आपके ।
सादर रामप्रभु ने पक्षीराज का
दाह किए जैसे अपने बाप के।।
जटायु
Comments
4 responses to “जटायु”
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वाह
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Thank you
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सुन्दर
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Good
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