जब बंधे कलाई पर राखी

केवल धागे की रीत न हो
असली का रक्षाबंधन हो
जब बंधे कलाई पर राखी
सच्ची रक्षा संकल्पित हो।
पावन धागा जब बहन
बांधती है भाई के हाथों में,
रक्षा की जिम्मेदारी
आ जाती है उन हाथों में।
जिम्मेदारी केवल पैसे
गिफ्ट आदि तक नहीं रही,
जिम्मेदारी हर सुख-दुख में
साथ निभाएं बोल रही।
याद रखो प्यारी भगनी को
कष्ट मिटाओ भगनी का
रक्षाबंधन यही सिखाता
साथ निभाओ भगनी का ।
—— डॉ0 सतीश पाण्डेय

Comments

7 responses to “जब बंधे कलाई पर राखी”

  1. .बिल्कुल सही कहा

  2. This comment is currently unavailable

    1. धन्यवाद जी

  3. Geeta kumari

    बहुत सुंदर विचार

    1. धन्यवाद जी

  4. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

  5. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

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