निर्भय आगे बढ़ता चल,
कोई रोके कोई टोके,
किसी की बात से ना जल।
किसी को देख कर बढ़ते,
अक्सर लोग करते छल।
कंटक बिछाने राहों में,
कुछ हाथ आएंगे
तो कंटक हटाने राहों से,
कुछ साथ आएंगे
उन्हें साथ लेकर चल,
ना रुक राही राहों में कभी,
ना कर परवाह अरि की पथिक,
मिलेगी मंजिल मुकद्दर साथ देगा,
जला मशाल चलता चल।।
_____✍️गीता
जला मशाल चलता चल
Comments
6 responses to “जला मशाल चलता चल”
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” कंटक बिछाने राहों में,
कुछ हाथ आएंगे
तो कंटक हटाने राहों से,
कुछ साथ आएंगे
उन्हें साथ लेकर चल,”
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति सामाजिक चेतना जागृत करने में कारगर साबित होती हुई आपकी कविता अत्यन्त सुंदर है।-
इतनी सुन्दर और प्रोत्साहन देती हुई समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏 बहुत-बहुत आभार। आपका आशीष बना रहे
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निर्भय आगे बढ़ता चल,
कोई रोके कोई टोके,
किसी की बात से ना जल।
——कवि गीता जी की सुन्दर कविता, बेहतरीन अभिव्यक्ति-
बहुत सुंदर और उत्साह वर्धन करती हुई समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी
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बहुत सुंदर लेखन
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आभार पीयूष जी बहुत-बहुत धन्यवाद
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