कविता-जहर पिला दो
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जहर पिला दो
जहर खिला दो
मम्मी पापा उपकार करो
जन्म नहीं देना मम्मी
दर्द मेरा एहसास करो
मुझ नन्हीं बच्ची पर
हवसी रहम नहीं करता है,
मन की प्यास बुझा कर के
मुझ को आग हवाले करता है
रोती हूं खून से लथपथ
मुंह में कपड़ा होता है
मुंह पर चांटा मार रहा
कुत्तों सा नोच रहा होता है
चाह नहीं मां मैं भी आऊं
आंचल में तेरे दूध मैं पाऊं
होगा मां भला तेरा-
दूध के संग जहर पिला दो,
बचपन बीते संग संग तेरे,
मिले सयानी सब के संग,
जात पात के भेंट चढ़ जाऊंगी
जिस दिन मम्मी तुम सबको
अपने कान्हा का पता बताऊंगी
समय के संग
सुंदरता आए,
सुमन भी अपनी,
पहचान बनाए
क्या दोष मेरा आप बता दो
एसिड से तन है जलता
इससे बचने का उपाय बता दो,
घुट घुट के मरने से अच्छा है
झुक झुक के चलने से अच्छा है,
मां मुझको बचपन में ही जहर पिला दो,
खान-पान वेशभूषा पर
मां आज भी पाबंदी है
देश मेरा आजाद हुआ है
निर्भय होकर मुझे –
चलने की आजादी नहीं है
जहर पिला दो
भ्रूण हत्या कर दो
मां मैं तेरी प्यारी गुड़िया हूं,
दुख नहीं मुझको
मैं तेरे हाथों से मर जाऊंगी,
मां समझ मुझे,
फिर धरती पर लाना मुझे
सब कुछ सह सकती हूं
पर रेप का दर्द नहीं सह पाऊंगी,
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कवि-ऋषि कुमार प्रभाकर–
जहर पिला दो
Comments
4 responses to “जहर पिला दो”
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बहुत सुंदर रचना, सुन्दर अभिव्यक्ति
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बहुत ही मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है कवि ऋषि जी ने अपनी इस कविता में। बहुत ही हृदय विदारक रचना है। बेहतर शिल्प और कथ्य में समन्वय स्थापित करती हुई रचना।
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अति सुंदर
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अतिसुंदर भाव
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