जहाँ बसाते चलें

कुछ पाना हमारा मकसद न हो
देने की लत खुद को लगाते चलें
जीवन हमारा यह रहे न रहे
दूसरों का जहाँ चलो बसाते चले ।
हमने देखा दुनिया की भीड़ में भी हम अकेले है
क्यूँ न अकेले ही आशियाना बसाने चले ।
बहुत सह लिया अपनो से सितम
फिर क्यू उनके नाम का दीप जलाते रहे ।
मेरी भावनाओं की जिन्हें कद्र ही नहीं
क्यूँ उनकी बेरूखी पे आँसू बहाते रहे ।
जिन्हे आँसूओ की कद्र ही नहीं
क्यूँ उनके खातिर खुद को जलाते रहे।
कयी ऐसे है जिनकी उम्मीदें हैं हमसे जुङे
क्यू न उनके लिए ही खुद को फिर से बनाते चलें ।
जीवन का मकसद बदले में पाना नहीं
बिना पाये ही परहित में खुद को लुटाते चले ।
ज्यादा नहीं, पर कुछ के लिए बहुत कर सकते है हम
चलो दूसरों की खुशी को अपना मकसद बनाते चले।

Comments

13 responses to “जहाँ बसाते चलें”

  1. वाह वाह, बहुत खूब

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर भाव

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Prayag Dharmani

    सुंदर रचना

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

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