जुल्म से कांपी इंसानियत

जब जब ज़ुल्म की जलजले इस ज़मीन पे फन फैलाया।
तब तब इन्सान की इंसानियत खून की आँसू ही रोया।।

Comments

6 responses to “जुल्म से कांपी इंसानियत”

  1. वाह, “जब जब ज़ुल्म की जलजले इस” में अनुप्रास से अलंकृत पंक्तियाँ सहज की आकर्षित कर रही हैं।

  2. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब। अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग।

  3. बहुत ही सुन्दर

  4. बहुत सुंदर भाव

  5. मोहन सिंह मानुष Avatar

    सुंदर अभिव्यक्ति

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