जब जब ज़ुल्म की जलजले इस ज़मीन पे फन फैलाया।
तब तब इन्सान की इंसानियत खून की आँसू ही रोया।।
जुल्म से कांपी इंसानियत
Comments
6 responses to “जुल्म से कांपी इंसानियत”
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वाह, “जब जब ज़ुल्म की जलजले इस” में अनुप्रास से अलंकृत पंक्तियाँ सहज की आकर्षित कर रही हैं।
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बहुत ख़ूब। अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग।
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बहुत ही सुन्दर
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बहुत सुंदर भाव
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बहुत खूब
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सुंदर अभिव्यक्ति
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