जो भी लिखता है मन

जो भी लिखता है मन
स्वयं के लिए,
प्यार-नफरत के भाव
खुद के लिए।
उसे न जोड़ना
कभी भी
अपने भावों के लिए
अपनी चाहत के लिए।
अलग ही रास्ते हैं
न कोई वास्ते हैं,
न कोई दूरियाँ
न करीबियाँ हैं।
मन के जो भाव लिखे
लिखा जो दर्द यहां
वो स्वकीय नहीं
अनुभूतियां हैं।
परानुभूतियों को
उतारा कागज पर
न समझो कि
लिखा किस पर है।
खुद के सुख के लिए है
सृजन यह,
खुद की रोमानियत का
गीत है यह।
गा रहा आँख बंद कर
सुरीली- बेसुरी,
खुद के सीने में
चुभा कर के छुरी।
निकलती वेदना को
लिख-लिख कर
दर्द दूजे का
खुद में सह सह कर,
जो भी सृजित हुआ
वो कहता है,
बिना किसी को किये
लक्षित वह,
खुद ही खुद में
मगन सा रहता है।

Comments

14 responses to “जो भी लिखता है मन”

  1. सर बहुत खूब, वाह

    1. Satish Pandey

      बहुत धन्यवाद

  2. बहुत ही अच्छी कविता

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Geeta kumari

    लाजवाब अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

  4. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  5. बहुत ही सुन्दर

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  6. Praduman Amit

    बहुत सुंदर भाव ।

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

    1. Satish Pandey

      Thank you

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