जो सुख है ब्रह्मचर्य में,
वो सुख नहीं है,
दुनिया के झमेले में ।
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रीढ़ की हड्डी टूट जाती,
बुढ़ापा आने से पहले .
कमर की पसलिया कहती
रे मूरख कामी लाठी पकड़ ले
नहीं तो गिर जायेगा खूद के गड्ढ़े में ।.
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सज्जन, संत जीवन मुस्कुराकर जीता है
दुर्जन कामी दिनभर रोता रहता है ।।
जय श्री सीताराम ।।
जो सुख है ब्रह्मचर्य में,
Comments
3 responses to “जो सुख है ब्रह्मचर्य में,”
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आपकी सोच बहुत ही उच्च स्तरीय
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अति उत्तम रचना जय सीताराम
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सच है ब्रह्मचर्य का पालन करने को प्रेरित करती कवि विकास जी की रचना
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