टूटते गुलाब !!

आज तोड़ दी मैंने
पीली पत्तियां पौधों से
उसी तरह जैसे
मैं दिल से बेदखल
हुई थी तुम्हारे !
हरी पत्तियों पर जब पड़ती हैं
ओस की बूंदें
तो तुम्हारे होंठों पर
टूटते गुलाब याद
आते हैं…
हरी-हरी घास को जब
कंघी करती
ये हवाएं हैं तो
याद आ जाता है
वो हसीं लम्हा
जब तुम गेसुओं में मेरी
अपनी उंगलियां फेर देते थे
आज तोड़ दी मैंने वो
पीली पत्तियां पौधों से
अब सिर्फ हरी-भरी पत्तियां ही रह गई हैं !!

Comments

12 responses to “टूटते गुलाब !!”

  1. Geeta kumari

    दिल को छू गई ये पंक्तियां।….. कवियित्री ने बहुत ही नज़ाकत और सुंदरता से अपनी यादों का जिक्र कर दिया।
    अति उच्चस्तरीय लेखन प्रज्ञा,…..keep it up.

  2. Pratima chaudhary

    प्राकृतिक उपमानों के सून्दर प्रयोग से ,मन की व्यथा का बहुत सुंदर चित्रण

  3. Praduman Amit

    बहुत सुंदर चित्रण है।

  4. Satish Pandey

    वाह, बीती बातों को पीली पत्तियों का उपमान दिया गया है।पीली पत्तियों तो तोड़ना ही ठीक रहता है। ताकि हरे भरे तरीके से आगे बढ़ा जा सके। अतीव सुन्दर लेखनी को सैल्यूट है प्रज्ञा जी।

    1. आभार भाई साहब

  5. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    लक्षणा शब्द शक्ति का बहुत ही सुंदर प्रयोग, सकारात्मकता की तरफ शुरुआत के सुंदर भाव
    बहुत सुंदर कविता

    1. आपका धन्यवाद

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