ठेस की आदत मलिन है

चैन से अब सो रहा मन
मत जगा अब आग तू,
दूर हो जा स्वप्न से भी
मत लगा अब आग तू।
आग केवल शान्त है।
भीतर पड़े हैं कोयले
फूंक मत, रहने दे ऐसे
मत जला अब बावरे।
शांत जल तालाब का
लहरें उठा कर खामखाँ
मत अमन में विघ्न कर तू
बात इतनी मान ना।
राह अपनी शांत अपना
दूसरों को ठेस मत दे,
ठेस की आदत मलिन है
यह बुरी लत फेंक दे।

Comments

10 responses to “ठेस की आदत मलिन है”

  1. अति उम्दा सर

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    उम्दा लेखन

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

  4. सुंदर शिल्प व भाव

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

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