**डोली अरमानों की**

अनगिनत सपनें लेकर
बैठी थी डोली में
कैसे होंगे ससुराल वाले
यह प्रश्न उठा करता था मन में
विदा होकर परिजनों से
पिया संग चल दी
मेरे अरमानों की डोली भी
मेरे साथ चल दी
मेरे सपनों को मेरा पति ही
पूरा करेगा
जिस डगर चलूंगी
मेरा साथ देगा
बसाऊंगी घर मैं उसके दिल में
कोई ना होगा संग
पर पिया साथ होगा
जब आई ससुराल तो
एक-एक करके
टूटते नजर आए सपनें
रोई मैं फूट-फूट करके
जो डोली अरमानों की
साथ आई थी मेरे
उठ गई अर्थी उसकी सदा के लिए!!

Comments

3 responses to “**डोली अरमानों की**”

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  2. कवि प्रज्ञा जी की बहुत ही सुंदर और काबिलेतारीफ अभिव्यक्ति है यह। एक उभरती हुई रचनाकार की प्रखर झलक है वाह

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