तिमिर बढ़ती जा रही

अवसाद के बादल घिरे
पर तुम न आये प्रिये
यह तिमिर बढ़ती जा रही
बुझे हर उजास के दिये ।
आक्रोश है या ग्लानि इसे नाम दू
कैसे खुद ही मौत का दामन थाम लूँ
मकबूल नहीं यह शर्त हमको
कयी मुमानियत जो हैं दिये ।

Comments

9 responses to “तिमिर बढ़ती जा रही”

  1. सुंदर तथा हृदयविदारक पंक्तियां

    1. Suman Kumari

      सादर आभार

  2. बहुत अच्छी कविता

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बेहतरीन

    1. Suman Kumari

      सादर धन्यवाद

  4. ह्रदय स्पर्शी रचना

    1. सादर आभार

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