अवसाद के बादल घिरे
पर तुम न आये प्रिये
यह तिमिर बढ़ती जा रही
बुझे हर उजास के दिये ।
आक्रोश है या ग्लानि इसे नाम दू
कैसे खुद ही मौत का दामन थाम लूँ
मकबूल नहीं यह शर्त हमको
कयी मुमानियत जो हैं दिये ।
तिमिर बढ़ती जा रही
Comments
9 responses to “तिमिर बढ़ती जा रही”
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सुंदर तथा हृदयविदारक पंक्तियां
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सादर आभार
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बहुत अच्छी कविता
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सादर धन्यवाद
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बेहतरीन
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सादर धन्यवाद
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ह्रदय स्पर्शी रचना
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सादर आभार
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बहुत खूब
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