तुझ सा ही अकेले

अपनी चाहतों के लो आज
वो फिर गुलाम हो गये
कैसी होती थी सुबहें
अब कैसे शाम हो गये
छुपते अपने ही घर जो
दोस्तों के आने जाने पर
उन्ही दोस्तों की चाह में
जहां तक सुनसान हो गये
किनसे है हिकारत हमें
और क्यों हो शिकायत कोई
गलतियां दुहराने से ही तो
फलहीन कई बगान हो गये
अब तो रहना होगा सबको
तुझ सा ही अकेले राजीव
गीली मिट्टी की महक वाले भी
कीच के लिए ललायमान रह गये

Comments

2 responses to “तुझ सा ही अकेले”

  1. Geeta kumari

    अपनी चाहतों के लो आज
    वो फिर गुलाम हो गये
    __________ इंसान को चाहतों का गुलाम नहीं होना चाहिए यही सुंदर संदेश दिया है आपने अपनी इस कविता में, कवि राजीव रंजन जी की बहुत उम्दा रचना

  2. अति सुंदर लेखन

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