तुम्हारी आँखे

कल अचानक ही तुम्हारी तस्वीर पर आकर
ठहर गईं मेरी निगाहें…
और मैं उलझकर रह गयी तुम्हारी
आँखों के तिलिस्म में ..!!

गहरी ख़ामोशी समेटे हुए सागर सी ये तुम्हारी आँखे,
साक्षी हैं ज़िन्दगी के न जाने कितने तूफानों,
न जाने कितने ही चक्रवातों की,
दर्द के लाखों मोती रोज ही मिलते हैं
इस सागर की तलहटी में..!!

जानते हो एक दिलचस्प किस्सागोई करती हैं ये,
तुम्हारे होंठों से कहीं ज़्यादा कहानियाँ बसती
हैं तुम्हारी आँखों में,
तुम्हें पता है, एक पूरी ज़िन्दगी बिताई जा सकती है
इन्हें पढ़ते हुए..!!

उदासियों द्वारा कत्ल की गई शामों के लहू में डूबी
ये तुम्हारी कत्थई आँखे जब भी नम होती होंगी
तो अमावस के अंधेरों से लड़ते हुए किसी
सुर्ख तारे सी चमकती होंगीं,
जब तुम हँसते होंगे तो हजारों जुगनू झिलमिलाते
हुए नज़र आते होंगे इनमें…!!

तुम्हारी इन आँखों को निहारते हुए अचानक ये
एहसास हुआ कि ईश्वर का निवास इंसान के
हृदय में नहीं बल्कि आँखों में होता है.. !!

सुनो! अगर कल को ज़िन्दगी से हारी हुई कोई
तलाश तुम्हारी आँखों मे पनाह माँगे न तो
उसे निराश मत करना,
क्योंकि मैं चाहती हूँ कि ये दुनिया इस तथ्य को जाने
कि इस क़ायनात में अब भी एक महफूज़ जगह है
और वो है ‘तुम्हारी आँखे’…!!

©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

Comments

6 responses to “तुम्हारी आँखे”

  1. उम्दा रचना

  2. Geeta kumari

    एहसास हुआ कि ईश्वर का निवास इंसान के
    हृदय में नहीं बल्कि आँखों में होता है.. !!
    …………… आंखों को लेकर बहुत ही खूबसूरत रचना लिखी है आपने अनु जी । बेहद शानदार प्रस्तुति…

  3. अनुवाद

    धन्यवाद सखि

  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति

  5. बहुत ही सरस रचना

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