तुम्हें नहीं मालूम ,
मगर मंसूबों को तेरे ,
मैं जान लेता हूं,
रहता हूं परेशान,
मगर; फिर भी
खुद को हर हाल में ,
संभाल लेता हूं,
और इत्तेफाक से
तुम्हारी आंखों और
लफ्जों का तालमेल,
बिगड़-सा गया है आजकल ,
बस !इन्हीं हरकतों से ,
तुम्हें पहचान लेता हूं,
इन्हीं हरकतों से ,
तुम्हें पहचान लेता हूं।
तुम्हें नहीं मालूम…
Comments
20 responses to “तुम्हें नहीं मालूम…”
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वाह क्या बात है
सुन्दर रचना-

बहुत बहुत आभार 🙏
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NICE
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Thank you
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Wow, very nice poem
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Thank you 🙏😊
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जितनी तारीफ करूँ कम है
in fact इस महीने आपकी सबसे सुन्दर रचना
यह मेरे विचार हैं बस-

🙏🙏🙏🙏
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‘लफ़्ज़ों का तालमेल बिगड़ सा गया है आजकल’ बहुत अच्छी लाइन है..इस सुंदर रचना के लिए आप बधाई के पात्र है
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बहुत बहुत आभार प्रयाग जी 🙏
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Very nice👏
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बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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बहुत बहुत धन्यवाद
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सुंदर
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हार्दिक धन्यवाद 🙏
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बहुत ही सुंदर, आपकी लेखनी को सैल्यूट
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बहुत बहुत धन्यवाद सतीश सर 🙏🙏
ऐसे ही प्रेम बरसाते रहे हैं और हौसला बढ़ाते रहें हैं
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Nice
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धन्यवाद
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