तुम कब बाहर घर से

निकलूं कब बाहर मैं घर से
हरदम बैठा रहता मौसम के डर से
एक साल में बारह महीने
चार महीने गिरे पसीने
फिर सोचूं मैं निकलूं बनके
तब होती बरसात जमके
आठ महीने यूं ही गुजरे
फिर आए जाड़े की करवट
बाहर निकले कांपे थरथर
तुम ही बताओ बारह महीने
ऐसे ही मौसम के डर से
निकलूं कब बाहर में घर से।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज

Comments

9 responses to “तुम कब बाहर घर से”

  1. Virendra sen Avatar
    Virendra sen

    कविता का शीर्षक निकलूं कब बाहर घर से है ।

  2. वाह वाह, अतीव सुन्दर लेखन, बेहतरीन

  3. साल के सभी मौसम का चित्रण प्रस्तुत करती हुई बहुत सुंदर कविता

    1. Virendra sen Avatar

      आभार आपका

  4. उम्दा रचना

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