सुबह का पहला ख़्वाब हो तुम
जैसे कोई मेहकता गुलाब हो तुम
भरी दोपहरी का यौवन, और
शाम का ढलता शबाब हो तुम
कभी मेहक तो कभी मेहखाना हो
जैसे रात में घूंट घूंट चढ़ता शराब हो तुम
अल्फाज़ो की सुंदरता दिखनेवाली
मानो एक प्यार भरी किताब हो तुम
हुस्न की परिभाषा का दीदार
जैसे बरसात में निकलता आफ़ताब हो तुम
सामने होकर भी एक कल्पना सी हो
जो भी हो मगर लाजवाब हो तुम
तुम
Comments
4 responses to “तुम”
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बहुत खूब
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Bahut bahut Dhyanyawad sir🙏
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सुंदर उपमा
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Shukriya…😊😊😊
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