तू मानव है कुछ सोच रहा।

तू निर्मल है तू निर्भय है , क्या बैठ यहाँ तू सोच रहा।
विधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।।

ये जीवन है जीते हैं सब, कुछ लोग यहाँ रोते रोते
इसमे भाग्य का दोष नही, ये मानव है सोते सोते
सब अपनी करनी भोग रहे, तू इनको क्या अब देख रहा

विधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।।

नम आंखों को तू पोछ जरा , जीवन का अब सम्मान तू कर
उठ कर अपने पैरों पर तु, इस दुनिया पर एहसान तू कर।
तेरे साहस के आगे बढ़कर, कौन तुझे अब रोक रहा

विधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।।

Comments

6 responses to “तू मानव है कुछ सोच रहा।”

  1. Satish Pandey

    तेरे साहस के आगे बढ़कर, कौन तुझे अब रोक रहा

    विधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।।
    —- अतीव सुन्दर पंक्तियां। बहुत सुंदर कविता। वाह लेखनी से बहुत सुंदर साहित्य उदभूत हुआ है।

  2. mishra pradeep

    धन्यवाद पांडेय जी

  3. Nice thought awesome poetry

    1. mishra pradeep

      Thanks

  4. Geeta kumari

    भाग्य से आगे कर्म प्रधान को श्रेष्ठ बताती हुई बहुत सुंदर कविता

    1. mishra pradeep

      Thanks

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