तृष्णा तुम भी अद्भुत हो
मन में इतना रम जाती हो,
ये भी मेरा वो भी मेरा
सब कुछ मेरा हो कहती हो।
पूरी कभी नहीं होती हो
जीवन भर आधी रहती हो,
नश्वर जीवन में नाशवान
सुख को पाने को कहती हो।
क्षणिक सुखों की खातिर मैं
अनमोल समय इस जीवन का
सदा लुटाता फिरता हूँ
ऐसी प्रेरणा देती हो।
सुख से और अधिक सुख पाऊँ
दूजे का हक भी मैं खाऊँ,
सारी रौनक मैं ही पाऊँ
ऐसा स्वार्थ सिखाती हो।
बचपन, यौवन और बुढापा
वक्त निरंतर चलता जाता
पाया, खाया, खूब कमाया
फिर भी आधी रह जाती हो,
कभी नहीं पूरी होती हो।
अन्त समय तक पर्दा बनकर
नैनों को ढकती रहती हो,
सच को समझ नहीं पाता
इतना सम्मोहित करती हो।
तृष्णा तुम भी अद्भुत हो
मन को विस्मित कर देती हो
कभी नहीं पूरी होती हो
आधी ही रह जाती हो।
——– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
तृष्णा तुम भी अद्भुत हो
Comments
6 responses to “तृष्णा तुम भी अद्भुत हो”
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वाह, तृष्णा, लालसा पर इतनी बेहतरीन कविता वाह
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बहुत शानदार है
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मनुष्य की इच्छा मृत्यु के उपरांत ही समाप्त होती है,बहुत ही सुंदर रचना
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तृष्णा पर कवि के बहुत ही सुन्दर और सटीक विचार, बहुत ख़ूब
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अतिसुंदर भाव
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बहुत सुंदर, अति उत्तम
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