तेरी रजधूल ओ प्रियतम!

तुम्हारी राह देखकर ही तो मैं टूट गई
हर रिश्ते से ऊपर था तू
तेरे इश्क में मैं मगरूर हुई
तेरे इश्क का चंदन घिसकर
अंग प्रफुल्लित हुए सदा
तेरी रजधूल ओ प्रियतम! मेरे
मेरी माँग का सिन्दूर हुई।
बूंद-बूंद कर मैनें तेरे प्रेम का
रसपान किया
तेरे नाम से ही मैनें
नवजीवन का निर्माण किया।
तेरी स्मृतियों के आगे मैं तो
खुद को भी भूल गई।
फिर क्यों छोड़ा दामन तुमने
आखिर मुझसे क्या खता हुई?
तेरे वियोग में ओ प्रियतम!
यह प्रज्ञा!
कल पुष्प-सी थी अब शूल हुई।।

Comments

18 responses to “तेरी रजधूल ओ प्रियतम!”

  1. Satish Pandey

    वाह क्या बात है, कितनी गहरी बात है कविता में, जियो

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    Nice poetry

  3. Suman Kumari

    बहुत सुन्दर

  4. Suman Kumari

    bhut sindar

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद 🙏🙏

  5. सहज सुन्दर शब्दकोश
    आपने प्यार का कोना कोना झाँक लिया है इस कविता में।
    awesome poetry

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद

    2. Pragya Shukla

      🙏🙏👏👏

  6. वाह क्या बात है।
    उत्तम भाव पूर्ण रचना

    1. Pragya Shukla

      🙏🙏

    2. Pragya Shukla

      थैंक्स फॉर कमेंट्स

  7. vivek singhal

    This comment is currently unavailable

  8. बहुत बढ़िया

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