मर्यादा की पराकाष्ठा सद्गुणों के धाम
हे पुरुषोत्तम तुम्हें बारम्बार प्रणाम
अवतार पूर्व मनुष्यता थी विकल
ज्ञानी ध्यानी सारे संत थे विफल
अत्याचार मुक्ति की न थी युक्ति
विलुप्ति की ओर अग्रसर थी भक्ति
अवतरण से तेरे कष्ट को मिला विश्राम—
अज्ञात थे पथ जिसपे मनुष्यता बढ़े
भयग्रस्त से सब कब किस ओर चढ़े
रावण से थे चहुओर कोने कोने भरे
कैसे सब की पीड़ा का हो अवसान—
तेरे आने से सबको मिला आराम
सबके ही कष्ट दुख मिटे अभिराम
उत्सव की हुई हर पल शुरुआत
सुखद कथाओं की मिली अचल सौगात
देवताओं का भी विचलित मन हुआ शांत
तेरे नाम की महिमा का है अब सहारा
तुम बिन हे शाश्वत कहां कोई कहीं प्यारा
फिर से मानवता हो रही है व्यथित
सब हो रहे हैं क़ैद कहां कोई पथिक
तेरे जन्मदिन से हो फिर नया विहान
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