वो तख्त कहाँ वो ताज कहाँ
वो कलगीधर सा शाह कहाँ।
हे दशमपिता हे गुरु गोविन्द
तेरे बिन मुझे कुछ चाह कहाँ।।
,,,,,,,,कोटि कोटि प्रणाम,,,,,,,,,
तेरे बिन मुझे कुछ चाह कहाँ
Comments
8 responses to “तेरे बिन मुझे कुछ चाह कहाँ”
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🙏🙏🙏
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Good
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Nice
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Good
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Nice
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Good
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अति सुन्दर रचना
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Waheguru ji
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