दो पंक्तियाँ तुम पर न लिख पाऊं
तो मैं भी कवि नहीं,
स्वप्न तक शायरी न पहुंचाऊं
तो मैं भी कवि नहीं।
जब कभी मन टूट कर
बिखरा हुआ हो, दर्द हो,
दर्द तक मलहम न पहुंचाऊं
तो मैं भी कवि नहीं।
तो मैं भी कवि नहीं
Comments
10 responses to “तो मैं भी कवि नहीं”
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बहुत ही सुंदर लिखा है पाण्डेय जी
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सादर धन्यवाद जी
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बहुत ही सरस कविता, क्या शानदार सोच है वाह
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बहुत बहुत धन्यवाद
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वाह, बहुत सुंदर कविता है ।कवि के अतीव सुंदर भावों की अभिव्यक्ति बहुत ही खूबसूरती से हुई है । लेखनी से सुंदर साहित्य प्रस्फुटित हुआ है ।
लेखनी को मेरा सादर प्रणाम ।-
इतनी सुंदर समीक्षा हेतु सादर प्रणाम गीता जी, आपकी लेखनी प्रेरणादायी और उत्साहवर्धक है। पुनः अभिवादन
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सुंदर वचन
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बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा बहन
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वाह वाह क्या बात है!!!!!
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सुन्दर प्रस्तुति
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