तज़ुर्बा

‘दिखा दिया ये तज़ुर्बा भी ज़िन्दगी ने हमें,
हैं कितने शख्स ज़हर, और दवा है कितने..
न रोशनी को इल्म, न ही चिरागों को पता,
है कितने बुझने और मंज़ूर-ए-हवा हैं कितने..’

– प्रयाग

मायने :
इल्म – ज्ञान

Comments

12 responses to “तज़ुर्बा”

    1. Prayag Dharmani

      🙏🙏

    1. Prayag Dharmani

      शुक्रिया

  1. सुन्दर,उत्तम काव्य

    1. Prayag Dharmani

      Thanks For Compliment

  2. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब। ज़िन्दगी के दर्शन करवाती हुई बहुत शानदार रचना।

    1. आभार आपका

    1. Prayag Dharmani

      आभार

    1. Prayag Dharmani

      आभार आपका

Leave a Reply

New Report

Close