दिल के मन्दिर में…

हम बेकार ही तुम्हें
अपना समझा करते थे
यादों में तेरी अक्सर
तड़पा करते थे
तुम तो हो दूजे की
बाहों का हार प्रिये!
हम तुमको अपना
दिलबर समझा करते थे
बुनते थे तुझको पाने के अरमां
ख्वाबों में भी तुझको
माँगा करते थे
देवता थे तुम प्रज्ञा* के
दिल के मन्दिर में
तुमको अपना मान के
पूजा करते थे…

Comments

8 responses to “दिल के मन्दिर में…”

  1. ❤ वाह ✍👌👌

  2. उम्दा प्रस्तुति

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत खूब

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