दीपक की भी एक सीमा है

रात भर दीपक जला,
भोर होने लगी तो बोला,”अब मैं चला”
मैंने कहा और जलो, अभी अंधियारा बाकी है,
“मेरी भी एक सीमा है”, कह कर वो मुस्कुराया
उसकी अर्थपूर्ण मुस्कुराहट में,
एक संदेशा मैंने पाया…
जिसकी जब जितनी ज़रूरत हो,
वह उतना ही मिल पाता है।
उसे पता है, सूरज के आगे उसका क्या काम,
वो चतुर है, उसे समझ है,
उसकी भी एक सीमा है,।
ये उसको भी है भान।

Comments

21 responses to “दीपक की भी एक सीमा है”

  1. Shakti Kumar Tripathi

    Very nice sister g

    1. बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  2. Praduman Amit

    बहुत अच्छी कविता है।

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अच्छी रचना
    प्रेरक भाव

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  4. Satish Pandey

    बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  5. बहुत ही अच्छी

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

    1. Geeta kumari

      Thank you neha ji 🙏

  6. Satish Pandey

    दीपक ‘तत्सम ‘ और सूरज “तदभव ” के माध्यम से लक्ष्यार्थ का वर्णन हुआ है, बहुत ही सुन्दर. दीपक को सूरज के सामने अपनी सीमा का भान है, वाह

  7. Geeta kumari

    प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार सतीश जी🙏

  8. उम्दा।
    अच्छी शब्दावली का प्रयोग

  9. Devi Kamla

    Wah waahh

    1. Geeta kumari

      Shukriya ji

  10. Piyush Joshi

    बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      Thank you so much Piyush ji 🙏

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