दोहे

गरीब गरीब रह गया, सेठ सौ गुना सेठ।
खाई सा अंतर हुआ, भूख बराबर पेट।।1
गरीबों के उत्थान की, बनी योजना लाख।
कागज में पूरी हुई, उस तक पंहुची खाक।।2
—– सतीश पाण्डेय

Comments

19 responses to “दोहे”

  1. Geeta kumari

    यथार्थ चित्रण 👏

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar

    यथार्थ परक प्रस्तुति

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

  3. Indu Pandey

    सुंदर दोहे, सावन और कवि को इन पंक्तियों के लिए धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      Thanks

  4. MS Lohaghat

    वाह, वास्तव में गरीबों के लिए बनी योजनाएं उन तक पहुँचने से पहले ही पूरी हो जाती हैं,

    1. Satish Pandey

      Dhanyawad

  5. Praduman Amit

    100 प्रतिशत सही।

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      🙏💐

  6. Vasundra singh Avatar

    लॉकडाउन ने इस अंतर को और बढा दिया है

    1. Satish Pandey

      जी बिल्कुल सत्य है, धन्यवाद

  7. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    क्या बात कही है आपने
    सत्य सटीक यथार्थ।
    शासक हीं शोषक हुए
    गए कहाँ कृष्ण व पार्थ।।

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद पण्डित जी 🙏💐

  8. Kumar Piyush

    क्या शानदार पंक्तियाँ सर

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

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