गरीब गरीब रह गया, सेठ सौ गुना सेठ।
खाई सा अंतर हुआ, भूख बराबर पेट।।1
गरीबों के उत्थान की, बनी योजना लाख।
कागज में पूरी हुई, उस तक पंहुची खाक।।2
—– सतीश पाण्डेय
दोहे
Comments
19 responses to “दोहे”
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यथार्थ चित्रण 👏
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सादर धन्यवाद जी
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यथार्थ परक प्रस्तुति
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सादर आभार
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सुंदर दोहे, सावन और कवि को इन पंक्तियों के लिए धन्यवाद
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Thanks
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वाह, वास्तव में गरीबों के लिए बनी योजनाएं उन तक पहुँचने से पहले ही पूरी हो जाती हैं,
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Dhanyawad
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100 प्रतिशत सही।
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धन्यवाद जी
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सुंदर
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🙏💐
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लॉकडाउन ने इस अंतर को और बढा दिया है
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जी बिल्कुल सत्य है, धन्यवाद
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क्या बात कही है आपने
सत्य सटीक यथार्थ।
शासक हीं शोषक हुए
गए कहाँ कृष्ण व पार्थ।।-
सादर धन्यवाद पण्डित जी 🙏💐
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क्या शानदार पंक्तियाँ सर
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धन्यवाद
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👍
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