धरा के सच्चे हीरे हैं

आशा भी न थी कि मिल पायेंगे
बचपन के कई साल गुजारे साथ
दशकों तक सिर्फ याद बन जायेंगे
मीठे ख्वाब फिर कहीं गुम जाएगें

बहस में पड़ने वाले कई होंगे
सामंजस्य बिठाने वाले थोड़े हैं
मतभेद को जो मिटा सके
वो ही धरा के सच्चे हीरे हैं

सुख दुख के साथी हम सब
किसी के अधिकार से दूर रहें
बड़ी मुश्किल से मिलें है यारों
आपसी तूं तूं मैं मैं से दूर रहें

सभी मुसाफिर हैं यहां जगत में
शदियों से लगा आना जाना हैं
खेल खिलौने धन थे पहले से ही
बस मेरा तेरा साथ ही पुराना है

Comments

5 responses to “धरा के सच्चे हीरे हैं”

  1. Geeta kumari

    आशा भी न थी कि मिल पायेंगे
    बचपन के कई साल गुजारे साथ
    दशकों तक सिर्फ याद बन जायेंगे
    मीठे ख्वाब फिर कहीं गुम जाएगें
    ___________ बचपन के साथी से दोबारा मिलने पर अपनी खुशी व्यक्त करती हुई कवि राजीव रंजन जी की बहुत ही सुंदर कविता , शिल्प और भाव का सुन्दर समन्वय

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    “बहस में पड़ने वाले कई होंगे
    सामंजस्य बिठाने वाले थोड़े हैं
    मतभेद को जो मिटा सके
    वो ही धरा के सच्चे हीरे हैं” वाह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

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  4. बहुत खूबसूरत रचना

  5. बहुत ही लाजवाब

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