चौसर खेलने वाले भी
जग में पूजे जाते हैं
राज़-काज,अनुज,पत्नी और प्रजा
सर्वस्व दांव पर रखकर भी
एक भी बाजी ना जीते
सर्वस्व हार ही जाते हैं
समय की विडम्बना देखो
ऐसे लोग भी
धर्मराज कहलाते हैं
धर्मराज़:- युधिष्ठिर
Comments
9 responses to “धर्मराज़:- युधिष्ठिर”
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Nice line
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Thanks
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मार्मिक और सही बात कही है
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धन्यवाद
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Nyc
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थैंक्स
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वाह बहुत सुंदर
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भावपूर्ण अभिव्यक्ति
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बहुत ही लाजवाब रचना
सच थोड़ा कड़वा होता है महाभारत और वर्तमान में
नारी के शोषण को व्यक्त करती बहुत सुंदर रचना
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