नयन आपके राह भटका रहे हैं,
जरा सा चलें तो अटका रहे हैं।
हुआ क्या अचानक उन्हें आज ऐसा
हमें देख जुल्फों को झटका रहे हैं।
इल्जाम हम पर लगाओ न ऐसे,
दिल ए द्वार वे खुद खटका रहे हैं।
दिल टूटने से दुखी हैं बहुत वे
मगर गम नहीं है, जतला रहे हैं।
नयन आपके
Comments
7 responses to “नयन आपके”
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Bahut khoob
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सुंदर
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वाह सर बहुत खूब
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सुन्दर
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कवि सतीश जी की श्रृंगार रस से परिपूर्ण अति सुंदर रचना ।
सुन्दर भवाभिव्यकती -

वाह जी वाह
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अतिसुंदर
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