देवी माँ का पूजन कर लो
लेकिन अपनी मां मत भूलो,
जिसने जनम दिया तुमको
वृद्धाश्रमों में ठूँसो।
थोड़ा सा सोचो-समझो,
बुजुर्गों की इज्जत कर लो,
अपने संतोष की खातिर उनको
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो।
जींर्ण शरीर क्षीण ताकत को
एक सहारा वांछित है,
बनो ठोस सहारा तुम
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो।
पूजन कर लो खुश रहो मगर
मां-बाप त्याग कर क्या पूजन
मां-बाप हैं ईश्वर यह समझो
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो।
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो
Comments
7 responses to “वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो”
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सही कहा…
अच्छा संदेश -

अतीव सुन्दर
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Very true
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बिलकुल सही कहा आपने ।
पहले जो घर की देवी है उसका सम्मान करें । चाहे वो माँ , पत्नी, बहन बेटी या सहकर्मी हो। -
कवि सतीश जी ने अपनी इस रचना के माध्यम से यह समझाने की सफल कोशिश की है कि हमें अपने बड़ों, बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए , ना कि उनकी सेवा करने की उम्र में उन्हें वृद्धाश्रम जैसी जगह पर छोड़कर अपने फ़र्ज़ से मुंह मोड़ लिया जाए । बहुत सुंदर संदेश और बहुत ही सुन्दर कविता..
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वाह अतिसुन्दर रचना
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बहुत खूब
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