निर्भया कितनी दफा रोई
दरिंदों की पनाहों में
सिसकता ही रहा यौवन
वासना की बाँहों में
तब तलक रूठेगा बचपन
पूँछती है यही नारी
मरेगी कब तलक बेटी
बचेगा कब तलक अत्याचारी
पुरुष की बन के कठपुतली
नाचती क्यों है हर औरत
उसी के आँचल में है जन्नत
और कदमों तले शोहरत
उसके आगे तो ईश्वर भी
सिर झुकाता है
नारी ही जने पुरुष को
वह ये क्यों भूल जाता है
तो आखिर क्यों उसी कोख को
कलंकित करता है कोई
यही सोंचकर प्रज्ञा’ हाय !
कितनी दफा रोई..
निर्भया कितनी दफा रोई…
Comments
5 responses to “निर्भया कितनी दफा रोई…”
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बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति
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Thanks di
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अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति। सच को सामने रखती बेहतरीन कविता
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धन्यवाद
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मार्मिक
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