निष्प्राण

तीर, तलवार और तंज की धार से,
जब निष्प्राण हुआ शरीर
अनुप्रास ही दिखे कवि को,
यहां घायल पड़ा शरीर ।।

*****✍️गीता*****

Comments

10 responses to “निष्प्राण”

  1. बहुत ही गहरी भावाभिव्यंजना, वाह

    1. Thank you very much for your precious compliment satish ji🙏

  2. Seema Chaudhary

    Wow, गजब ये होती है कविता ।सागर जितनी गहराई लिए हुए बहुत ही सुन्दर पंक्तियां

    1. सादर धन्यवाद सर 🙏 बहुत बहुत आभार

  3. लाजवाब, बहुत सुंदर

    1. आभार भाई जी🙏

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