बाबू जी की टूटी कुर्सी
चरमर-चरमर करती है
जब बैठो उस कुर्सी पर
डाल की तरह लचकती है
बाबू जी उस कुर्सी पर
बैठ के पेपर पढ़ते हैं
और साथ में बाबू जी
चाय की मीठी चुस्की लेते हैं
सुबह सवेरे उठकर वो
रोज टहलने जाते हैं
लौट के आते जब बाबू जी
मल-मल खूब नहाते हैं
वह कुर्सी बाबू जी को
बेटे माफिक प्यारी है
टूट गई वह देखो फिर भी
बाबू जी को प्यारी है…
‘बाबू जी की टूटी कुर्सी’
Comments
4 responses to “‘बाबू जी की टूटी कुर्सी’”
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बहुत सुंदर बाल कविता
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बाबू जी उस कुर्सी पर
बैठ के पेपर पढ़ते हैं
और साथ में बाबू जी
चाय की मीठी चुस्की लेते हैं।
बहुत खूब, अतिसुन्दर पंक्तियाँ, लाजवाब अभिव्यक्ति।-

धन्यवाद
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अतिसुंदर भाव
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