नेत्रदान:-जीवनज्योति

एक अंधी लड़की देख के
मन में वेदना का ज्वालामुखी फूटा
सोई थी चिर निद्रा में
करुणा से अवधान टूटा…
मन में आया मेर जो
वह सबको आज बताती हूँ
मेरे नेत्र हैं कितने सुंदर
यह सोंच के मैं मुसकाती हूँ…
इन नेत्रों का जीवन
मेरे जीवन से लम्बा होगा
मेरी सुंदर आँखों से कोई
सारी दुनिया को देखेगा…
मर कर भी मैं अपना नाम
अमर कर जाऊंगी
करना चाहती थी कुछ बड़ा,
अब नेत्रदान कर जाऊंगी
नेत्रदान करना,
अपने वंश की बनाये परंपरा
अपनी आँखें देकर
किसी के जीवन में दें प्रकाश फैला..

Comments

4 responses to “नेत्रदान:-जीवनज्योति”

  1. Geeta kumari

    बहुत सुंदर सोच और बहुत सुंदर रचना

  2. अतीव सुंदर रचना, उत्तम भाव उत्तम शिल्प

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