पकड़ मत कान री मैया
कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।
शिकायत कर रही झूठी
कहानी सच की बताऊँ मैं ।।
करूँ क्यों मैं भला चोरी
घर में हैं बहुत माखन।
नचाती नाच छछिया पे
चखूँ मैं स्वाद को माखन।।
चूमकर गाल को मेरे
करती लाल सब ग्वालन।
छुपाने को इसी खातिर
लगाती मूँह पे माखन।।
सताई सब मुझे कितना
तुझे कैसे बताऊँ मैं?
पकड़ मत कान री मैया
कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।।
शिकायत कर रही झूठी
कहानी सच की बताऊँ मैं।।
चराए शौख से कन्हा
मिलकर ग्वाल संग गैया।
गरीबी में करे कोई
मजूरी हाथ से मैया।।
भरन को पेट मैं इनके
घर -घर खास की जाऊँ मैं।
‘विनयचंद ‘हो मगन मन- मन
लीला रास की गाऊँ मैं।।
पकड़ मत कान री मैया
कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।
शिकायत कर रही झूठी
कहानी सच की बताऊँ मैं।।
पकड़ मत कान री मैया
Comments
36 responses to “पकड़ मत कान री मैया”
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बहुत सुन्दर, बहुत खूब, वाह
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बहुत बहुत आभार सहित धन्यवाद
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Bahut sundar
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Thanks
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Gajab Ki poem h
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Thanks
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Good
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Thanks
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बहुत सुंदर रचना
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धन्यवाद
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बहुत सुन्दर
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धन्यवाद
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Nice poetry on my kanhaiyaji
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Thank you very much
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About sunder pt. Ji
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Thank you very much
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Thank you
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अतिसुन्दर, बहुत खूब, शास्त्री जी
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Nice poetry
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Thank you sir
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Nice poem
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Thank you very much sir
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बहुत खूब गुरुजी
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बहुत बहुत धन्यवाद सहित आभार श्रीमान्
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अतिसुन्दर रचना।
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धन्यवाद
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Bahut sundar
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धन्यवाद
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Very nice
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Thanks
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Nyc kavita
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Thank you
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वाह पंडी जी वाह , क्या कमाल की कविता लिखी है , आपकी कविता को पढ़के ऐसा , मानो खुलता गुलाब दिल में बहार , सच में आपकी कविता अनोखी है मन करता है कि बार बार पढू , अंत पुनः धन्यवाद
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Thankv you very much for your precious comment on my poem about shreekrishna
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Bahut hi sundar kavita h
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