पता नहीं तुम कैसे

पता नहीं तुम कैसे लिख लेते हो
कविता, इतनी आसानी से
मेरे तो ख्याल ही गुल रहते है
ठहरते ही नहीं कागज पर

Comments

14 responses to “पता नहीं तुम कैसे”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    उम्दा

  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुन्दर

  4. Satish Pandey

    अरबी से उत्पन्न शब्द ‘ख्याल’ के साथ ‘देशज ‘ गुल’ का प्रयोग बहुत ही सुंदरता के साथ किया गया है। वाह

  5. Mrunal ghate

    Very nice Anjali ji

  6. Prayag Dharmani

    Nice lines

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