पावन प्रकृति

जहां हवाएं पल-पल बनाएं एक नई तस्वीर
उसी आकाश में लिखना चाहूं मैं अपनी तकदीर
नन्ही बूंदे नई किरण संग बना रही रंगोली
मैं भी सुख के मोती ले लूं फैलाकर अपनी झोली
अपने हृदय में संजो के रख लू ऐसी मीठी यादें
जहां द्वेष ना कोई जलन हो सबकी प्यारी बातें
पल-पल की शांति को तोड़े कुछ ना छोड़े बाकी
बहती उस शैतान पवन की देखूं मैं गुस्ताखी
जहां घाटिया नाप रही हो अंधकार की सीमा
वही निझरनी प्रेम से बहती ना लांगे थी गरिमा
कुछ पल में भी सुनना चाहूं पंछियों की दो बातें
प्रकृति गोद में देखू सुख की पल-पल की बरसाते
जहां पे कोयल सुना रही हो एक प्यारा सा गीत
जहां पे जा एक साथ जुड़ रही धरा और नव की प्रीत

Comments

17 responses to “पावन प्रकृति”

  1. Geeta kumari

    बहुत सुंदर रचना है

    1. धन्यवाद आपका गीता जी

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    वाह वाह क्या बात है!!!!!!

    1. धन्यवाद आपका पंडित जी🙏

  3. Satish Pandey

    प्राकृतिक छटा के साथ खेलने की चाह रख रहे मन की सहज अभिव्यक्ति हुई है। शब्द युग्म ‘पल-पल’ का प्रयोग सुंदरता बढ़ा रहा है।
    सुख के मोती ले लूं फैलाकर अपनी झोली
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

    1. 🙏🙏आपका बहुत बहुत आभार 🙏🙏

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    प्रकृति के प्रति प्रेम भावना की बेहतरीन प्रस्तुति

    1. Priya Choudhary

      Thankyou 🙏

  5. Praduman Amit

    Very nice poem

    1. Priya Choudhary

      🙏🙏Thankyou 🙏🙏

    1. Priya Choudhary

      Thankyou 🙏

  6. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Priya Choudhary

      Thankyou

  7. प्रकृति का सुंदर प्रयोग करती हुई रचना बहुत ही सुंदर कला पक्ष

    1. Priya Choudhary

      Thankyou 🙏

      1. Abhishek kumar

        वेलकम

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